इसे रद्दी के ढेर में डालकर आमूल परिवर्तन के लिए बनाएं दूसरा विधेयक
संदर्भ: बैकिंग विधियां (संशोधन) विधेयक, 1968 22 अगरस्त 1968 को राज्यसभा में श्री चंद्रशेखर
महोदय, माननीय श्री अर्जुन अरोड़ा ने कहा है कि सामाजिक नियंत्रण का प्रयोग बड़े प्रयोजन के लिए किया जाता है। यह ‘‘सामाजिक नियंत्रण’’ शब्दों के अर्थ का सवाल नहीं हैं। यह सारे सामाजिक ढांचे को रूपान्तरित करने का सवाल है। आज सरकार जिस तरह से सोच रही है, उसका विचार स्थिति को यथावत बनाये रखने का है। वह सामाजिक रूपान्तरण नहीं चाहती है। इसमें कोई आश्चर्य की बात नहीं है कि जिन उद्योगपतियों का इन बैकिंग संस्थाओं पर नियंत्रण है वे इस विधान का विरोध कर रहे हैं क्योंकि संसार में सभी जगहों पर सामाजिक रूपान्तरण का सदैव कड़ा प्रतिरोध हुआ है।
यह कहना गलत है कि भारतीय रिजर्व बैंक को अधिक शक्तियां देने से सरकार वांछित लक्ष्य को प्राप्त कर लेगी। सरकार रिजर्व बैंक को चाहे जो भी शक्तियां दे दे, वह इन लोगों पर तब तक नियंत्रण नहीं रख सकती जब तक वह सम्पूर्ण ढांचे को, र्मुीा बाज़ार की पूरी व्यवस्था न बदले। यदि व्यवस्था को नहीं बदला गया और सरकार ने हर चीज़ का राष्ट्रीयकरण कर दिया और उसे पूंजीपतियों को सौंप दिया और यदि वे निदेशक बन गए तो इस सामाजिक नियंत्रण का कोई तात्पर्य नहीं रहेगा। सामाजिक नियंत्रण से केवल वाऽ स्वरूप में ही परिवर्तन होगा।
मैं वित्त मंत्रालय को यह चेतावनी देता हूं कि संसार की कोई भी शक्ति, कोई भी सरकार, चाहे वह कितनी भी शक्तिशाली क्यूं न हो, श्रमिक वर्ग के बीच कभी भी अनुशासन केा तब तक उत्पन्न नहीं कर पायेगी, जब तक वह निहित स्वार्थो को नियंत्रित नहीं करती। यदि मंत्री महोदय का यह विचार है कि बैंकिंग समवाय अधिनियम में एक खण्ड उपस्थित करके उसके द्वारा अनुशासन लाना चाहती है, तो वह भूल कर रही है। सरकार ने इतिहास से कुछ नहीं सीखा है इतिहास ने पर्याप्त सबक सिखलाएं हैं और ऐसी आशा की जा सकती है कि श्री के.सी. पन्त इतिहास से सबक सीखेंगे, इस विधेयक को रद्दी के ढेर में डाल देंगे और इसे सामाजिक आमूल परिवर्तन और संरचनात्मक परिवर्तन के लिए विधेयक बनाएंगे।